31
October 2014
07:00
धुंध भरी हो
राह हो
या
कंक्रीट के
जंगलों की
भयानक सड़क हो
चलता चल
ओ
राही !
जब तक चलती
सांस हो
तेरे मजबूत
कदम
डाह से भरते
तेरे सहोदर को
जो होते
तेरी जीत के
निशां
अकेला है तो
क्या हुआ
ओ राही !
तेरा मनोबल
तेरे साथ है
सांस टूटेगी
तेरी
तो
उठा लेगा
बाहों में तुझे
तेरा अपना
पंचतत्व
तेरा सांसारिक
हक छीननेवाले
अपने ही हाथों
बना जायेंगे
अपनी समाधि
तूने
दिया जो भी
समय को
सूद समेट
लौटाएगा वह जरूर
तेरे वारिस को
सुन राही !
पीछे न मुड़ना
कभी
क्योंकि
जीवन की राह
सदा आगे ही
आगे जाये
पीछे मुड़ने की
गुंजाईश
न छोड़े कभी
समय
बढ़ता चल
बस
हारना न
क्योंकि
तू सर्वहारा
की
सन्तान नहीं
जब तक है सांस
तब तक
बस बढ़ता जा
याद रख हारे
का
हरि भी नहीं
अपनी हर सांस
से
सदा कदम
मिलाता जा |
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