30
November 2014
18:31
-इंदु बाला
सिंह
रुकी
रुकी सी सांसें
चलने लगती हैं
पौ के फटते ही
....
और
मुस्काता सूरज
आ खड़ा होता है
मन की देहरी
पर ......
कर जाता है
वह
निहाल मन को
........
बस
यों ही चलता
रहता है
रात दिन का
चक्र |
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