शनिवार, 15 नवंबर 2014

रात में चेतते हैं चरित्र


09 November 2014
12:06
-इंदु बाला सिंह

पिछले तीन दिन के
मिले
' समाज में स्त्री का स्थान '
विषय पर लिखने को
ज्यों ही मैंने कलम उठायी
जग गयीं मुझमें अनगिनत
सोयी हुयी औरतें
और
आ कर खड़ी हो गयीं मेरे टेबल के सामने
हर एक को बोलना था
अपना दुःख
और चीखने लगीं
भन्ना उठा माथा मेरा
दूर खड़े मौन पुरुषों को भी 
सुनानी थी
अपनी समस्या
परेशान हो मैंने रखी कलम
देखा मैंने
एक खुशगवार मौन समुन्दर को
और
सो गयी
यह सोंच
कि
अब कल दिन में लिखूंगी
उस छात्र के लिये
रचना
क्यों कि उस समय
सब आत्मायें जंगलों में
भटक रही होंगी
अपने अपने
सुख की तलाश में |

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