मंगलवार, 4 नवंबर 2014

सुबह की आस


04 November 2014
01:08
-इंदु बाला सिंह

नामधारी रिश्ते
जब मिटते ......
क्यों नहीं चल पाता मन अकेला
जब जानते हम
सब स्वारथ के रिश्ते 
क्या कर्म में  शक्ति नहीं
कि
जपने को किसी नाम का सहारा ले लूं
कठिन होता
सब कुछ खो कर
फिर
सब कुछ पाने की चाह रखना
डराते प्रतिपल
अपनी उपस्थिति से प्रपंची दबंग धनिक
छलते
ठगते अपने
यह कैसा युद्ध है
जिसे हम लड़ते खुद से
प्रतिदिन
जलता दीपक कहीं दूर
और
उस दीपक से प्रकाशित मन
एक स्वप्न की आस लिये
हम सोते
और
फिर जागते भोर भोर
यह जानते हुये भी
कि
ख्वाब सच नहीं होते
फिर भी
ख्वाबों की रूपरेखा बना मर जाते हम हर रात
सुबह की आस लिये |




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