17
November 2014
20:24
-इंदु बाला
सिंह
आज भी याद
आता है
कभीकभार
सासु माँ !
मुझे
वह रात का सपना
जब तुम समाधि
लगा ली थी
उस रात एक अनजान
विशालकाय घर में
और
आंधी चल रही
थी
बाहर
मैं एक एक
कर
ढेर सारी
खिडकियां बंद कर रही थी
हड़बड़ी में
भयभीत सी ..........
स्वप्न टूटा
आधी रात को
और
उस स्वप्न के
बारह घंटे बाद
तुम गुजर गयी
थी
दूर राज्य के
अपने घर में
यह कैसी
टेलीपैथी थी
तुम्हारी
मेरे संग
या
यह महज एक
संयोग था
पर जो भी था
वह स्वप्न
अद्भुत था
मैं तो
नहीं जुड़ी थी
तुमसे इतनी कभी
कि
तुम्हें याद
करूं
ओ सासु माँ !
पर
शायद वह
मानवता का रिश्ता था
जिससे
शायद मेरा मन
जुड़ गया था तुमसे
पर
जिस रिश्ते ने
सुना वह स्वप्न
आश्चर्यचकित
हुआ था वह
एक पल को |
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