भूल चुकी
मैं तो दुःखद अध्याय जीवन के
क्या रखा अब बीते पल में
पुराने अपनों में
साथ न दिये रक्त संबंधी और रिश्ते
अहंकार में डूबे वे
ईश्वर की लाठी का प्रकोप भी वे भूल चले
चाहूँ मैं अब जीना
बिना आकांक्षा के ।
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भूल चुकी
मैं तो दुःखद अध्याय जीवन के
क्या रखा अब बीते पल में
पुराने अपनों में
साथ न दिये रक्त संबंधी और रिश्ते
अहंकार में डूबे वे
ईश्वर की लाठी का प्रकोप भी वे भूल चले
चाहूँ मैं अब जीना
बिना आकांक्षा के ।
लड़की को कॉलेज में एडमिशन में कोटा है
सरकारी छात्रवृत्तियां हैं
घरों में मुहल्लों में नवरात्रि में पूजी जाती हैं कन्याएँ
भाइयों की तरह पिता से पिटाई नहीं खाती लड़कियां
घर की इज्जत होती हैं लड़कियां
घर की नींव बनती हैं लड़कियां
फिर भी
साहित्य महिलाओं पर होनेवाले अत्याचार से भरा पड़ा है
आखिर क्यूँ और कैसे ।
आज देखती हूँ
बड़ी बिंदी लगाती हैं महिलाये
यद्यपि उनका साथी गुजर गया है
अच्छा लगता है इस परिवर्तन को देख कर
और
मुझे वह महिला याद आयी
जिसने अकेली औरतों को के मान के लिये कभी बिन्दी ही न लगाई
वह माँ याद आई
जिसने अपने दामाद के गुजरने पर खुद सिंदूर लगाना छोड़ दिया
कुछ लड़ाइयाँ अपने तरीके से लड़ते हैं
और
कुछ बंधन लड़कियां सहर्ष पसंद करती हैं
ब्याह करना लड़की के शान की बात है न कि जरूरत।
गूगल फोटो ने पुरानी याद दिखाई
भरे पूरे परिवार की
सब खुश थे
जमी ़बर्फ़ क्रच आवाज के साथ मन की दीवार छोड़ दी
अब श्रम करने की सामर्थ्य न रही
समय ने सब तहस नहस कर दिया था
आज आंखों में सुखद स्वप्न के निशान न हैं
चालीस वर्ष भी कुछ होते हैं ।
ब्याह के लिये
कुल गोत्र का ख्याल रखना है
लड़के की पक्की नौकरी चाहिये
दहेज का इंतजाम पिता करते हैं
ब्याह के बाद
अपना अपना भाग्य
और
जिसके पिता न हों
उसका भी अपना भाग्य
कब चेतोगी लड़कियों ।
किसान ने अपने चारों बच्चों को पढ़ने का मौका दिया
नौकरी मिल जाएगी
घर सम्हल जाएगा
माँ घर संभालती रही
अपनी निकम्मी संतानों का दुख भोगती रही
दोनों बेटे और एक बेटी ट्यूशन कर के हाथ खर्च निकलते रहे
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते रहे
वैकेंसी चार साल बाद निकली
प्रश्नपत्र लीक हुआ
रईसों ने प्रश्न पत्र खरीद लिया
परीक्षा कैंसल हो गई
न भाई को काम मिला और न बहन को
न उनका ब्याह हुआ
माँ पूरे परिवार का खाना बनाती रही
बीमार पड़ती रही
इलाज के लिए पैसे चाहिए थे
डॉक्टर फ्री में देख लिया था
पर दवाओं के लिए पैसे नहीं थे घर में
माँ ने अपने सपनों को गाँव की नदी में बहा दिया
अब बच्चे जंतर मंतर की भीड़ में जुड़ गये हैं
वे आंदोलनरत हैं ।