बच्चे थे
गणतंत्र दिवस था
वह स्कूल यूनिफार्म पहने बच्चों को सूर्योदय से पहले स्कूल बस में बैठाने निकलती थी
अब बच्चे बड़े हो गए हैं
विदेश में रहते हैं
खूब कमा रहे हैं….....
आज घर चुप हैं
ठंडा है
चाय पीनी पड़ेगी
वह रसोई में चल दी ।
My 3rd of 7 blogs, i.e. अनुभवों के पंछी, कहानियों का पेड़, ek chouthayee akash, बोलते चित्र, Beyond Clouds, Sansmaran, Indu's World.
बच्चे थे
गणतंत्र दिवस था
वह स्कूल यूनिफार्म पहने बच्चों को सूर्योदय से पहले स्कूल बस में बैठाने निकलती थी
अब बच्चे बड़े हो गए हैं
विदेश में रहते हैं
खूब कमा रहे हैं….....
आज घर चुप हैं
ठंडा है
चाय पीनी पड़ेगी
वह रसोई में चल दी ।
खाना पकाते समय हाथ में आता है
भगोना , थाली , डेगची
और
उनके संग जगता है सोया इतिहास
गैस चूल्हे के संग जगती है
कोयले की अंगीठी
और
कोयला खरीदने के लाइन में लगी एक बालिका
और
हंगामा
कुचली जाती है
कोयला भरे ट्रक से लाइन में लगी पांच वर्षीय लड़की .....
सेल के टाउनशिप की बेटी मैं
याद करती हूं
सेल का अस्पताल
डाक्टर की लाइन में एक पंद्रह वर्षीय लड़की
दर्द देते दांत को निकलवा कर साइकिल से लौटती घर
रात में कम्युनिटी सेंटर में फिल्म देख कर पड़ोसियों के संग लौटती लड़की
बस सांसे लेती रहती है वह अबोध लड़की .....
हम लिख नहीं पाते भविष्य तो
दुलारता है भूतकाल ।
रोज की तरह वह उठी
सब कुछ सामान्य था सड़क पर
बरामदों में बत्तियां जल रहीं थीं
कोहरा के कारण एक मीटर से ज्यादा दूर तक सफेद चादर छाई थी
दूर से कोई चला आ रहा था
छोटी मनुष्य की आकृतियां भी पास आती दिख रहीं थीं
सड़क के कुत्ते कहीं दुबके पड़े थे
गाएं कचरे के ढेर में खाना ढूंढ रही थी
वह बस चलती चली जा रही थी
सुबह की सैर स्फूर्ति पैदा करनेवाली होती है
दूर से एक विशालकाय साया तेजी से दौड़ता आ रहा था
जब तक वह कुछ समझे
उसे कुचल कर चला गया
बच्चे को सरकारी मुआवजा पंद्रह लाख मिला
हाथी शहर की सड़क पर कैसे पहुंचा
सरकारी कर्मचारी परेशान हैं ।
कचड़े में खाना ढूंढती गाय
बेटे के घर के पिछले कमरे में गठरी बनी मां
गांव में छूटी पत्नी
इलेक्शन के समय याद आतीं हैं
वैसे हम रोज देवी के सामने धूप जलाते हैं
घंटी भी बजाते हैं
एन जी ओ भी सम्हालते हैं ।
एक पुश्त को आजादी न मिली
दूसरी को अभाव मिला
तीसरी को मात्र कमाना खाना मिला
तीनों पुश्त ने श्रम किया मजदूर की तरह
किसी पुश्त को वसीयत में मकान न मिला
लड़कियां थीं न ।
औरत बचा लेती है समय अपने लिये
रात उसकी अपनी होती है
कोई कोना तलाशती है वह
और
अकेली बैठती है
यह उसका अपना साम्राज्य है
जिसकी वह मालकिन है
यादें उतरतीं हैं उसके सामने
कभी वह उन्हें चित्रबद्ध करती है
तो कभी लेखनबद्ध
दिमाग खाली हो।जाता है
फिर बीज पड़ते हैं
निकली कोंपल को
बकरे के डर से
पिंजड़े में रख सो जाती है ।