मन में
मौसम की तरह आते हैं विचार
वे हमे गढ़ते हैं
कभी कभी वे वास्पीभूत हो जाते हैं
जीवन की बगिया से खर पतवार चुन फेंकना हमारा कौशल है
निष्क्रिय इंसान खर पतवार के बिछौने पर भूखे पेट सोता है
भाग्य को कोसता है ।
My 3rd of 7 blogs, i.e. अनुभवों के पंछी, कहानियों का पेड़, ek chouthayee akash, बोलते चित्र, Beyond Clouds, Sansmaran, Indu's World.
मन में
मौसम की तरह आते हैं विचार
वे हमे गढ़ते हैं
कभी कभी वे वास्पीभूत हो जाते हैं
जीवन की बगिया से खर पतवार चुन फेंकना हमारा कौशल है
निष्क्रिय इंसान खर पतवार के बिछौने पर भूखे पेट सोता है
भाग्य को कोसता है ।
ब्याह
सुरक्षा है
अपनापन है
अकेलापन दूर करने का कानूनी साधन है
आपके पास कोई संबंधी न हो
तो पति ही सही है
पर
जीवन में कुछ बन पाने के लिए
जरूरी है अपने चारों ओर खींचना एक सीमारेखा
इसके अंदर हर किसी का प्रवेश निषिद्ध है ।
तहजीब पलती है
रईसों के घर में
गरीब के घर में पलती है लडा़इयाँ
लड़की लड़ती है घर में
लड़का लड़ता है घर और बाहर दोनों जगह
वे लड़ते हैं
रोटी के लिए
खाट के लिये
लोग इन लडा़इयों को समाज का परिवर्तन समझ लेते हैं
क्रांति समझने की भूल कर बैठते हैं
मिट जाती है
गरीब की भाषाएं और नस्लें
बंगाल के अकाल की तरह
कोई रईस कैद कर लेता है यह कहानी साहित्य के पन्ने में ।
मेरा पिता खो गया बचपन में
सपने देखे मैने
अंग्रेजी पढ़ कर नौकरी तलाशी
डाटा साइंस भी पढ़ लिया
पर नौकरी सोने के हिरण सी छलती गई
हाथ ही न आई
किसी राज्य का बाशिंदा न था
छोटी जात का न था
महज भारतीय पुरुष था
सच्चाई और मेहनत की उंगली पकड़ चलता रहा
जेब फटी थी
जो पैसे आए
विकराल अभाव के कुएं में गिरते रहे
मां बहन अपना मकान के सपने देखते रहे
और
मैं घर का छोटा बेटा अपना परिवार बसाने का
सपने आते रहे
बाल सफेद होते रहे ।
नदी के इस पार खड़ी हूं
जला दिया है लौटने का पुल खुद मैने
निहारूं मैं पुराना भग्नावशेष
जितना भी दौड़ूँ
आगे न बढ़ पाउं
यह कैसा मोह है पुरातन का
बढ़ने न दे आगे
बदबू भी न महसूस कर पाऊं
संबंधों के सड़ेपन की ।
वैराग्य आता है
स्वार्थी पिता , पति और पुत्र की तरह
तुम्हें किसी भी उम्र में
छुड़ा देता है ....
तुम्हारा हर दुनियावी रिश्ता
वानप्रस्थ कर देता है वह तुम्हे
तुम देश के आदर्श नागरिक नहीं रह पाते ।
खो गई मैं
अपने शब्दों में
रचनाओं में
महसूसा है मुझे
मेरे बेजुबान मित्रों ने
मकान की खिड़कियों दरवाजों और विशालकाय पेड़ों ने
मन तैरता है
बस यूँ ही
खोजता है जन्म का कारण
वृहद अभेद्य भुभुलैया सा मन
यात्रा करता रहता है अतीत से वर्तमान में
भविष्य कुहासामय है
हथेली भी न दिखे
रेखाएं कैसे पढ़ूं