खो गई मैं
अपने शब्दों में
रचनाओं में
महसूसा है मुझे
मेरे बेजुबान मित्रों ने
मकान की खिड़कियों दरवाजों और विशालकाय पेड़ों ने
मन तैरता है
बस यूँ ही
खोजता है जन्म का कारण
वृहद अभेद्य भुभुलैया सा मन
यात्रा करता रहता है अतीत से वर्तमान में
भविष्य कुहासामय है
हथेली भी न दिखे
रेखाएं कैसे पढ़ूं