वैराग्य आता है
स्वार्थी पिता , पति और पुत्र की तरह
तुम्हें किसी भी उम्र में
छुड़ा देता है ....
तुम्हारा हर दुनियावी रिश्ता
वानप्रस्थ कर देता है वह तुम्हे
तुम देश के आदर्श नागरिक नहीं रह पाते ।
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वैराग्य आता है
स्वार्थी पिता , पति और पुत्र की तरह
तुम्हें किसी भी उम्र में
छुड़ा देता है ....
तुम्हारा हर दुनियावी रिश्ता
वानप्रस्थ कर देता है वह तुम्हे
तुम देश के आदर्श नागरिक नहीं रह पाते ।
खो गई मैं
अपने शब्दों में
रचनाओं में
महसूसा है मुझे
मेरे बेजुबान मित्रों ने
मकान की खिड़कियों दरवाजों और विशालकाय पेड़ों ने
मन तैरता है
बस यूँ ही
खोजता है जन्म का कारण
वृहद अभेद्य भुभुलैया सा मन
यात्रा करता रहता है अतीत से वर्तमान में
भविष्य कुहासामय है
हथेली भी न दिखे
रेखाएं कैसे पढ़ूं
ब्याह तो करना ही है
ससुराल ही तुम्हारा घर है
पति बहुत कुछ छोड़ कर गया होगा
बेटा है न
उसको क्या चीज की कमी है
भाई अपना परिवार के उत्थान में लगा है
लड़की को मकान की क्या जरूरत
बेटी चालीस हजार रुपया महीना कमा रही है
भाड़े के घर में माँ के साथ है
दूसरी बेटी ने दोस्त का पति चुरा लिया है
लड़की सवर्ण है ।
भूल चुकी
मैं तो दुःखद अध्याय जीवन के
क्या रखा अब बीते पल में
पुराने अपनों में
साथ न दिये रक्त संबंधी और रिश्ते
अहंकार में डूबे वे
ईश्वर की लाठी का प्रकोप भी वे भूल चले
चाहूँ मैं अब जीना
बिना आकांक्षा के ।
लड़की को कॉलेज में एडमिशन में कोटा है
सरकारी छात्रवृत्तियां हैं
घरों में मुहल्लों में नवरात्रि में पूजी जाती हैं कन्याएँ
भाइयों की तरह पिता से पिटाई नहीं खाती लड़कियां
घर की इज्जत होती हैं लड़कियां
घर की नींव बनती हैं लड़कियां
फिर भी
साहित्य महिलाओं पर होनेवाले अत्याचार से भरा पड़ा है
आखिर क्यूँ और कैसे ।
आज देखती हूँ
बड़ी बिंदी लगाती हैं महिलाये
यद्यपि उनका साथी गुजर गया है
अच्छा लगता है इस परिवर्तन को देख कर
और
मुझे वह महिला याद आयी
जिसने अकेली औरतों को के मान के लिये कभी बिन्दी ही न लगाई
वह माँ याद आई
जिसने अपने दामाद के गुजरने पर खुद सिंदूर लगाना छोड़ दिया
कुछ लड़ाइयाँ अपने तरीके से लड़ते हैं
और
कुछ बंधन लड़कियां सहर्ष पसंद करती हैं
ब्याह करना लड़की के शान की बात है न कि जरूरत।
गूगल फोटो ने पुरानी याद दिखाई
भरे पूरे परिवार की
सब खुश थे
जमी ़बर्फ़ क्रच आवाज के साथ मन की दीवार छोड़ दी
अब श्रम करने की सामर्थ्य न रही
समय ने सब तहस नहस कर दिया था
आज आंखों में सुखद स्वप्न के निशान न हैं
चालीस वर्ष भी कुछ होते हैं ।