थका हारा मेरा मन
कभी खुद
तो
किसी के कहने पर मजबूरी में
घर में
देवी देवताओं के पूजन के कर्मकांड लगा रहता है
हर दिन किसी न किसी देवी देवता का है
थक जाती हूँ मैं
रसोई और रिश्तों का सम्हालते
अपने लिए कोई समय नहीं
इतना करने पर भी मुझमे ही कमी है लोगों की निगाह में
आज सोचूँ मैं
क्या हर अपने काम के बाद ईश्वरीय बंदन मौन हो के क्यों नहीं किया
क्यों मैने दूसरों की नकल किया
क्यों अपना समय कर्मकांड में खोया
धनोपार्जन के बारे में न सोंचा
क्यों निर्भर रही आजीवन
किसी के पैसों और मकान के सहारे जीवित रही ।