30
October 2014
08:45
-इंदु बाला
सिंह
बला
की जीवट होती हैं
कामवालियां
जूठे बर्तन
धोनेवाली
मौन सह्तीं
हैं
खुद पे लगे
चोरी के लांछन
क्योंकि वे
लांछन सदा झूठे होते हैं
यह वे भी
समझती हैं
ठसकदार होती
हैं
कामवालियां
हाथ चमका कर
कहती हैं .......
अरे !
हम भी जानती
हैं कितनी तनख्वाह मिलती हैं
स्कूल में
टीचरों को
मुश्किल से
तीन हजार मिलता है
दबंग होती हैं
कामवालियां
धमका के रखती
हैं
वे मालकिन को
...........
हमारी बस्ती
के लोग न घुसें
इस कालोनी में
तो गंध मारे
यह शानदार खुशबूदार कालोनी
अपने सफ़ेद बाल
रंगी कामवालियां
किसी स्कूल
में पढ़े बिना ही
पढ़ा जाती हैं
हमें
श्रम का पाठ
स्त्री मुक्ति
का पाठ |
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