30
October 2014
07:11
-इंदु बाला
सिंह
घर तो
बहुओं का
होता है
सोंच
सह गयी
रह गयी वह
पर
वृद्धावस्था
में
जब वह अकेली
हो गयी
तब
बेटे गुरु बन
गये थे उसके
और
वह अपनी
सोंचने की ताकत खो चुकी थी
उसे शहर की
सड़कें देखने का मन करता था
उसका मन्दिर
जाने का बहाना निष्फल होता था
भगवान का चित्र तो घर में ही था न
उसका अस्पताल
जाने का बहाना भी निष्फल होता था
क्योंकि
उसकी
अस्पताल से लायी दवा रहती थी घर में
घर में
अब रूपये गुम
हो जाते थे उससे
डांट पड़ती थी
उसे
अपने पुत्र
से
जब वह दो माह
में
एक बार आता
था घर में
वह उम्रदार
औरत अब बच्ची बन चुकी थी
कभी दया आती
थी मुझे
उसपे
तो कभी
तृप्ति
कैसी ऐंठ कर
चलती थी वह
जेवर से सजी
धजी रंग बिरंगी साड़ियों में
और
उस पड़ोसन वृद्धा की
दयनीय स्थिति
ने
बना दिया था
मेरी बिटिया
को सिरफिरी
वह घर के हर
रिश्ते से विश्वास खो चुकी थी
शायद
परिवर्त्तन के
बीज
हर घर में लग
रहे होंगे
ऐसा लगने लगा
मुझे |
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