शनिवार, 1 नवंबर 2014

पिता का मन महसूसती पुत्री


31 October 2014
23:21
-इंदु बाला सिंह

पुकारता हूं सबको
पर
आता नहीं कोई
खाली यही बिटिया आती है ....
आजीवन विशालकाय दरख्त सा
सबको छांव देता पिता
बिस्तर से हिल न पाता था पिता 
पर वह
पुत्री का अहसान न चाहता था 
हर मुसीबत की आहट महसूस पुत्री ही पास पहुंचती थी पिता के
रात में
पिता दर्द से चीखता था
माता और पुत्र ए० सी० आन कर सोते थे
आखिर कोई कितना जागे
पुरुष नर्स भी सोता रहता था
पिता रात दिन जागता था
शरीर के घाव से चीखता था
चिल्लाता था
घबरा कर 
पुत्री रात में  उठ जाती थी
देखती थी
पिता को लेटे लेटे अपने सफेद गमछे मोड़ते फिर खोलते हुये
हर आहट पर पलट कर
अपने कमरे का द्वार देखते हुये
उसे हैरत होती थी
पिता न दिन में सोते थे
न रात में
और
अंतिम समय में तो
न जाने क्या सूझी सबको
पिता को पलंग से हटा  चौकी पर सुला दिया गया था
आजीवन मजबूत सहारा रहे पिता को
इस तरह तड़पते देख
बेचैन हो
चक्कर खा गिर जाती थी
पुत्री
और अस्पताल में भर्ती होती थी
एक दिन मुक्त हुये तकलीफ से पिता
पर
पुत्री की आँखों में
बस गया पिता
क्यों कि
उस मजबूत दरख्त  पिता के टूटन
अकेलापन व कष्ट भोगते समय के पलों को
उसने ही
देखा था
महसूसा था |





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