30
September 2014
13:50
-इंदु बाला सिंह
हर सांस
एक कहानी है
जिसे
मन लिखवाता
मुझ से जबानी है
भला कैसे
भागे
मन
इस भीड़ से
घर
, वन , सड़क , आफिस भरे हैं
कहानियों से
कब्रिस्तान
भी अछूता नहीं
दिन तारीख
अंकित हैं
हर कब्र पे
श्मशान
में
हर मौसम
में
जलती हैं
कहानियां
निगोड़ी सांस
लिखवाती है हर कहानी मुझसे
जब जब मानव
जन्मेगा
जन्मेंगी
कहानियां
और
हवा के
बौराते ही
एक तूफ़ान
गुजरेगा
पल भर में
गड़ जायेंगी
सारी कहानियां
सिन्धु घाटी
की सभ्यता सरीखी
तब
जरूर एक दिन
कहीं न कहीं
एक नया खोजी
भी जन्मेगा
और
पुनर्जीवित
होंगी
एक एक कर के
कहानियां
कहानी
कभी मरती
नहीं
वह तो
शाश्वत रहती
है
बस
गड़ जाती है
मिट्टी में
भूली
बिसरी सभ्यता सी
और
इंतजार रहता
है उसे
बस
एक
पुकार का
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