26
September 2014
12:44
-इंदु बाला
सिंह
वह वृद्धा
अपने धनवान
स्वर्ग में बसे
वृद्ध
जीवन साथी की
समझदार पत्नी
थी
दूर राज्यों
में
बसे
तीन पुत्रों
की माँ
निज पुत्रों
की अनुपस्थिति में भी
उनके दुर्गुण
भूल
सदा
उनका वैभव व सदगुण बखानती थी
पुरुष
सत्तात्मक समाज में
पुत्रों के
अवगुण गा के
पड़ोसियों से
अपने पुत्रों
का अपमान करवाना
और
पुत्रियों की
सहायता लेना
उसके लिये
सेहतमंद न था
पर
पुत्र के आने
पर
उनके सामने
अपनी जरूरतों
के लिये
वह
मिमियाती थी
कुछ जरूरतें
पूरी होतीं
थीं
कुछ के लिये
धमका के
या
फुसला के
बहाने बन जाते
थे
सब समझ के भी
नासमझ थी माँ
और
कामवालियां
अपना मेहनताना
और
लल्लो चप्पो
में व्यस्त थी
सुहाग की
निशानी मिटने के बाद भी
माँ
न जाने कितनी
लम्बी आयु ले के आयी थी
हर रोज
दूरस्थ
रिश्तेदार करते थे
उस वृद्धा की
तेरही का
इन्तजार
आखिर विवाह
और तेरही ही वह मौका होता है
जब
सब दूरस्थ
रिश्तेदार जुटते हैं
घर में
और
एक
दुसरे को पहचानते हैं |
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