12
October 2014
23:15
-इंदु बाला
सिंह
चीखें
.....
अनगिनत चीखें
.........
सत्य के नाम
पे
सहिष्णुता के
नाम पे
चीखो तो जानूं
इतिहास गवाह
है
कितनी बहीं
हैं नदियां खून की
मिटी हैं
सभ्यतायें
गरूर पे
जितना जोर से
चीखोगे
दूसरे के बारे
में मनचाहा विचार
कालान्तर में
वह झूठ
सच बन जायेगा
आज सच ठिठुर
रहा है
झूठ का कम्बल
ओढ़े दुबका है वह
क्या
प्रयोगशाला में
पढ़ेंगे हम सच
और
उस के कंकाल
की हड्डियां परखेंगे
हम एक दिन |
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