03
December 2014
13:53
-इंदु बाला
सिंह
खोली मुट्ठी
आज
तो
पाया उसे
खाली
ये कैसा जीवन
जिया हमने
कि
न जाने
किसने थी लूट
ली
हमारी
सारी गाढ़ी कमाई
शिकवा
नहीं तुझसे ए वक्त ........
फिर सुबह होगी
इन्तजार है
तेरा अब भी
ओ भोर के सूरज
!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें