12 December 2014
10:38
-इंदु बाला सिंह
कुर्सी चाहिये थी बैठने के लिये ...........
किसी ने न दी कुर्सी मुझे
तो
छीन ली कुर्सी मैंने ............
अब शांत हूं
बंधी हूं कुर्सी की मर्यादा से
और
कुर्सी की ताकत से
पर न भूली हूं वे थके पांव
कलम चला जाउंगी मित्र तेरे लिये
निश्चिन्त रह ..........
कहानी की
विक्रमादित्य की चमत्कारी कुर्सी सी
हर कुर्सी महत्वपूर्ण होती है ............
याद है मुझे
गरिमा बनाये रक्खा
जिसने कुर्सी की
वही
पकड़ कर रख पाया अपनी कुर्सी |
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