गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

जीने के लिये


12 December 2014
07:08
-इंदु बाला सिंह


खुल गयी मुट्ठी
पर यादों के भूले बिसरे खत
उतराते रहे जल में
और
हम नदी में
हाथ पांव मारते रहे
जीने के लिये |

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