शनिवार, 13 दिसंबर 2014

खुद को कर बुलंद


13 December 2014
19:11
-इंदु बाला सिंह


बड़ा प्यारा होता पैसेवाला पूत
और
आदरणीय मेहमान होता पैसेवाला दामाद
कहने को हैं भाते पूत
पर
सदा सिरदर्द होते वे
अपनों के
उनका इलाज होता कोर्ट कचहरी में
सरल को न जग पहचाने
और
गुम जाते कितनी ही संतानें
समय की आंधी में
जग तो स्वार्थ का डेरा
चल रे मन !
क्यों तू फ़िक्र में पड़ा
खुद को कर इतना बुलंद
कि
खे पाये तू अपनों की नैय्या |

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