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December 2014
21:07
-इंदु बाला
सिंह
कितने
पत्थरदिल हम ........
पड़ोस की बिलख न सुनाई देती हमें .......
यह भी शायद
जीने की कला है
कि
घर के बुजुर्ग
की लाश छुपा बेटी ब्याहते हम ......
सोंच में पड़ा
है आज मन
आखिर क्यों
कोई बना धनवान
तो कोई
अभावग्रस्त ......
ऐसा भी क्या
स्वार्थ कि भूलते हम अपनों को
अपना घर बसते
ही ......
कैसे निर्मोही
बनते हम अपने खून के रिश्तों से
एक टुकड़े जमीन
के लिये कटते मरते
आपस में ........
आपस में ........
यह कैसी शान
है हमारी बुद्धि और बल की
कि
हम नापते केवल
अपने दिल की धड्कन
और भूल जाते अपने
जन्मदाता को ..........
ये कैसा मोह है हमारा आनेवाले कल के प्रति
कि
भूल जाते
हम अपने आज को |
हम अपने आज को |
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