30 July
2014
07:41
-इंदु बाला
सिंह
खुश रहे हम
मुस्कुराते
रहे हम
रिश्ते दरों
में
बेहया कहलाते रहे हम ........
अपने ही घर
में
अजनबी कहलाते
रहे हम
मुहल्ले में
थे अबूझ पहेली
लोग बातें
बनाते रहे
पर
जिस दिन
हमारी बिटिया
बनी कलक्टर
हमें फ्री में
चाय पिलाने को आतुर पड़ोसी
हमारे रिश्ते
के नेता को
चाय पिलाने
लगे
पल भर में
मौसम बदल गया
बिन दहेज के
बिटिया के
ब्याह के लिये
घर में आने
लगे |
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