08 August
2014
11:57
-इंदु बाला
सिंह
अपने ठगें
तो परायों को
क्यूँ दोष दें हम
बेहतर है
भूल जायें हम
कि
कोई अपना
भी था
रिश्ता
तो बस एक सुनहरा सपना था
आंख खुली तो टूट गया ........
चल बावरे मन
मौसम देखता जा
बरसात सदा
नहीं रहती
जाड़े में धुप
खिलती
गर्मीं में भी
शीतल बयार बहती .........
ऐसा भी घबराना
क्या
जब तक है दम
पांव में
हो मस्त मग्न
कर ले तू जी
कड़ा
कम से कम
तू न ठगना
किसी अपने को
बस
अपनी धुन में
चलता जा .......
अपने समय को
खुशगवार बनाता
जा |
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