23 August
2014
12:56
-इंदु बाला
सिंह
हमशा रहे
बाप बन के
पर
एक
बाप को बुढ़ापे में मिट्टी कोड़ कमाते
पेट भरते देखा
तो
बहुत सारे बाप
आ गये आंख के सामने
जो
अकेले हैं पड़े
दूर खुद कमाते खाते
आज मान ले रहा
है जी
कि
हम भी यूं ही
जी लेंगे
आखिर
हम भी बाप ही
तो थे |
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