रविवार, 14 सितंबर 2014

अभाव झेलता कर्मठ मजदूर


06 September 2014
22:52
-इंदु बाला सिंह

वह मजदूर
जिसके लिये हम तरसते हैं शहर में
भगवान बन के आया
हमारे घर में
संग लिये तीन वर्षीय बिटिया
बाप मिट्टी कोड़ता रहा
बिटिया नाली के पानी से कभी खेलती
तो
कभी घर की याद में बिलखती
उसकी माँ अस्पताल में थी
और
पिता पैसे कमा रहा था
अब फिर
जब बच्ची रिरियाने लगी
तब मैं तड़प उठी .....
अरे इतना रोयेगी बच्ची तो बीमार हो जायेगी
इसे चुप कराओ
मेरे बात अनसुनी कर मजदूर चुपचाप मिट्टी कोड़ता रहा
वह बच्ची रोती  रही
मुझे अफ़सोस हुआ खुद पे
क्यूँ मैंने इस छोटे बच्चेवाले को रखा काम पे
हार कर मैंने  फुसलाया बच्ची को
पर चुप न हुयी वह
बस
मुंह फेर रोती रही वह
अबकी बार आँख से डरा के
घुड़क लगायी मैंने उसे
डर के मारे
चुप हो गयी वह बच्ची
मैं खुश हुयी
कम से कम बीमार तो न होगी बच्ची
ऐसे रो रो के
मजदूर को देख मैं मुस्कायी
मानो कहा मैंने
देखो मैंने चुप करा दी तेरी बिटिया
और
अबकी मजदूर ने समझाया बिटिया को ........
कान्दिब नाहीं गला काटी देब से |

मैं चकित रह गयी
सुन मजदूर की अपनी बिटिया को धमकाने की भाषा को |



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