29 August
2014
22:37
-इंदु बाला
सिंह
रात के
सन्नाटे में
कभी
कभी याद आ जाती है वह रात
जब दिल के
दौरे को महसूसते पिता को ले
उस दिन सड़क
पर से सर सर गुजर रही थी
वह पिता के
एक मित्र की कार में
रात का
सन्नाटा और एक अकेले व्यक्ति का सहारा
एक पल भयभीत
हो गया था मन
और
उससे भी
भयानक थे वे पल
जब उस रात को
पिता आई० सी० यु० में भरती कर दिये गये थे
विभिन्न
चेक अप के बाद |
पिता के मित्र
तो पहुंचा कर अस्पतल लौट गये थे
पर
वह अपनी सारी
रात
अस्पताल के एक
खाली पड़े वार्ड के एक बेड पर
करवट बदलते
हुये गुजारी थी
जिसे अस्पताल
की एक नर्स ने
उस पर
दरियादिली दिखाते हुये दे दिया था रात में सोने के लिये
उस रात के
विशालकाय कमरे का भय
आज भी याद है
उसे ........
दोपहर को पिता
के मित्रगण पहुंचे थे अस्पताल
और
वह लौटी थी घर
|
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