गुरुवार, 18 सितंबर 2014

जीत की आकांक्षा


18 September 2014
20:46
-इंदु बाला सिंह

वह मुहल्ले की
एक अनोखी महिला थी
जिसे देख
पुरुष मौन थे
और
महिलायें तटष्ठ थीं
उस मित्रहीन के मन का युद्ध कौशल
गजब का था
जो
कभी न समझ पाया कोई निकटस्थ
न जाने
ये कैसी प्यास थी उस की 
अपनी मुक्ति की
कि
जो मिटाये न मिटी कभी
उसके मन से
और
हैरतजनक कर्तव्यबोध था
उस में 
जो
उसे सदा कमर से फेटा सदा बांधे रखने को
प्रेरित रखता था
शायद
समय के कोप ने
उसे सेनानी बना दिया था
और
वह क्रुद्ध हो
समय से युद्ध कर रही थी |

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