30 June
2014
22:31
-इंदु बाला
सिंह
बचपन के
वे पल
जो कैमरे में
न
हो पाये कैद
आज भी कैद हैं
निगाहों में
दिखते रहते
हैं
याद दिलाते
हैं
वो
आठ वर्ष की
उम्र
जब
बैठने में
मजा आता था
जांत की दूसरी
तरफ .....
अरी हाथ में
फफोले पड़ जायेंगे .....
की नसीहत
अनसुनी कर
जब बैठ जाती
थी
पैर फैला कर
और
खींचने लगती
थी जांत की मूठ |
तब
चाची लोकगीत
गीत की एक कड़ी गाती थी
और
उस कड़ी को
दुहराने का सुख
दुसरे हाथ से
जांत में
गेहूं डालना
धीरे धीरे
पिसे गेहूं का आंटा बन कर गिरना
दोनों पैर का
आंटे से नहा
लेना जैसा खेल
कितना खुबसूरत
था ......
इससे खुबसूरत
खेल था
ओखली में चने
की झींक डालना
और
चाची संग ओखली
में
मूसलों से चना
फोड़ डाल निकालना
लोकगीत
दुहराना .....
साड़ी के पाढ़
से धागे निकाल
कुरूई बिनना
चाची संग
थे
मजे के बचपन
के दिन .........
आज न चाची है
न वे दिन हैं
पर
उसे याद करने
वाला
ये
बच्चा दिल
जरूर है
जो
निगाहों में
ढूंढ रहा है
आज भी
वो खोये पल
उस दूरस्थ
अपना अस्तित्व
खो चुके
यादों के गांव
में |
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