रविवार, 13 जुलाई 2014

बुद्धि की ऐंठ


13 July 2014
21:51
-इंदु बाला सिंह  


ख्वाहिशें
आंख बंद कर लेटी रहतीं
एक तृप्त होते ही
दूसरी भूख से बिलबिला कर जग जाती .....
ये मन भी कितना  कमीना है
कभी कौड़ी के मूल्य बिकता
तो
कभी बोली लगानेवाला हिम्मत हारता ........
बुद्धि जब जब ऐंठ कर चलती थी 
तब तब 
मन सांस की साँस रूक जाती .थी .......
और
फिर
एक दिन सुना मैंने
वे दोनों
कुत्ते की मौत मरे  |

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