15 July
2014
22:18
-इंदु बाला
सिंह
संगियों के
एक एक कर के
मौत की खबर
और
उसके घर जा
कर
शोक प्रकट
करने के बाद
घर लौटने
पर
अपने साथियों
के बिछड़ने का शोक तोड़ देता था
पिता
को ........
मृत साथियों
का मृत्युभोज तो खा आते थे
पिता
पर
मिलने पर
मुझसे
कह उठते थे
.............
बहुत जी लिया
मैं
मेरे गाँव व
शहर के संगी साथी
साथी चले गये
ज्यादा नहीं
जीना चाहिए अब मुझे .......
और
एक दिन सच में
पिता चले गये ..........
पिता की तेरही
में
उनके चित्र के
सामने रोता रूप
पिता के वृद्ध
मित्र का
कभी न हटा
मेरे स्मरण से
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