18 July
2014
22:23
-इंदु बाला
सिंह
कैसी बहन
और
अब कैसी भाभी
हम भूल चले
उनकी पकायी
रोटियां
पुरियां
होली की
गुजिया भरे डब्बे
और
दिवाली के
लड्डू ..........
मिली
हमें तो अब
अपनी
घरवाली .......
किस किस को
याद रखें हम
अब तो
तनख्वाह
न पूरी पड़े हमारी |
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