रविवार, 2 मार्च 2014

लोक हिताय

लोक हिताय
का
पाठ
न जाने
किस पुस्तक में
पढ़ लिया था उसने
कि
उसके इर्द गिर्द के लोग
उस अकेली की गलतियों से सम्हल रहे थे
और
वह
भौंचक सबको
अपने जीवन में रमते देख रही थी
जिनके लिए
उसने
सब कुछ त्यागा था
उनके लिए
वह भूतकाल बन चुकी थी ........
आज
मैं सोंचूं
ये
कैसी पुस्तक थी ........
वह
कैसा इंसान था
जिसने
उस नन्ही बालिका को
वह पुस्तक
पढ़ने दी थी ...........
और
वह कैसा विद्यालय था
जहां
खाद पानी पा कर
उसके विचार पल्लवित हुए थे |






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