यारों
!
इक शाम की मैं
बात बताउं
अपने घर की छत
पर मैं खड़ी थी
और
उड़ते बादलों
संग उड़ रही थी
चिड़ियों संग
चहक रही थी
तभी
आफिस से जल्दी
लौट आई
बिटिया मेरी
देख मुझे छत
पे
किचकिचायी
..........
तुम भी न मम
छत पर क्यों
घूमती हो
भला अकेले
छेड़ते हैं
सहकर्मी मेरे
लगता है
तेरी मम छत पर
दिन भर रहती है
पड़ोसी को लाईन
मारती है ....................
अच्छा है
तुम
कुछ महीने को
गाँव चले जाओ
अपनी सास की
सेवा कर आओ ......
डरी सहमी मैं
बिटिया का
मातृत्व देख रही थी
मन ही मन
दहल रही थी
और
गांव का विकृत
रूप
मेरी आँखों
में
तैर रहा था |
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