शनिवार, 22 मार्च 2014

जी लें हम


आगे न बढ़ पाते जब पांव
तब मुड़ मुड़ ढूंढें  हम
अपने भूले बिसरे जिए चित्र ........
कितना
ऐंठ कर निकलता मकान से
इक मुस्काता इंसान ............
नहीं सुरक्षित है आज उसका बचपन किसी बच्चे में
जीवन में चढ़ गया वह इतनी ऊँचाई
इतना ऊँचा  सपना न देखे इस  भौतिक युग में कोई .....
क्यों लौटें हम .... ख्यालों के पल में
क्यों न आगे ही बढ़  लें अब हम भले ही धीरे धीरे
और जी लें अपनी  मुट्ठी के पल |

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