शुक्रवार, 28 मार्च 2014

पुराने शहर का निचला तबका



कहने को
निचला तबका है
पुराने शहर में
पर
जीते हैं रिश्ते
वहीं
पितृहीन  बच्चे भी 
पलते हैं पढ़ते हैं
इन्ही कुनबों में ........
इन घरों के बच्चे
सरकारी स्कूल में नहीं
प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं
और
सुरक्षित भी रहते हैं समाज में ..........
उसी तबके से मिलते हैं
हमें
कारीगर
दुकानदार ........
यही तबका कभी कभी
एक बड़ा व्यापारी
भी गढ़ता है ........
यह
मेहनत कश निचला तबका
गूँथ कर रहता है
आपस में ........
इस तबके में
बुजुर्ग अकेले नहीं पड़ते
जीवन संध्या में
वे घिरे रहते हैं अपने घर में
छोटे छोटे  नाती नतिनी और पोते पोतियों से ...........
यहाँ
घर के युवा
काम पे
सुबह को निकल  रात को ही लौटते हैं .........
शहर के
ये मेहनतकश 
अभाव में भी
जीने की राह सिखाते हैं 
हमें |

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