कहने को
निचला तबका
है
पुराने शहर
में
पर
जीते हैं
रिश्ते
वहीं
पितृहीन बच्चे भी
पलते हैं पढ़ते हैं
इन्ही कुनबों
में ........
इन घरों के
बच्चे
सरकारी स्कूल
में नहीं
प्राइवेट
स्कूलों में पढ़ते हैं
और
सुरक्षित भी
रहते हैं समाज में ..........
उसी तबके से
मिलते हैं
हमें
कारीगर
दुकानदार
........
यही तबका कभी
कभी
एक बड़ा
व्यापारी
भी गढ़ता है
........
यह
मेहनत कश
निचला तबका
गूँथ कर रहता
है
आपस में
........
इस तबके में
बुजुर्ग अकेले
नहीं पड़ते
जीवन संध्या
में
वे घिरे रहते
हैं अपने घर में
छोटे
छोटे नाती नतिनी और पोते पोतियों से
...........
यहाँ
घर के युवा
काम पे
सुबह को
निकल रात को ही लौटते हैं .........
शहर के
ये मेहनतकश
अभाव में भी
जीने की राह सिखाते हैं हमें |
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