कभी कभी
सन्नाटा सा
छा जाता है
भरे
पूरे शहर में .......
कोई
न पहचान का रहता है जब
हम मीलों
चलते हैं तब
अकेले
निरुद्देश्य
से
अपने
ही स्थान में बैठे बैठे ........
हम यूँ ही
तब तक चलते
रहते हैं
जब तक
अंधड़ थम न
जाता |
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