शनिवार, 29 मार्च 2014

शहर सूना हो जाता है


कभी कभी
सन्नाटा सा छा जाता है
भरे पूरे शहर  में .......
कोई न पहचान का रहता है जब
हम मीलों चलते हैं तब
अकेले
निरुद्देश्य से
अपने ही स्थान में बैठे बैठे ........
हम यूँ ही
तब तक चलते रहते हैं
जब तक
अंधड़ थम न जाता |

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