सर
पर ट्रंक रख तक पहुंचाता था
गाँव से शहर
के स्टेशन तक
वो खून के
रिश्तों के ......
बड़े बाप का
बेटा
वह गांव में
रह
बाप का धन
बचाता था
मंद मंद
मुस्काता था ......
चौबीस पचीस का
युवा वह
पिता माता से
दूर
रिश्तों की
डांटे खाता था .....
न स्कूल गया न
प्यार पाया
घर में ही
अपनों का
मजदूर बना .....
न जाने क्यों
कहीं चला गया
एक हकदार कम
हुआ
मारो साले को
...अच्छा हुआ चला गया ....
इस सम्बोधन के
साथ
वो गुम गया
इस जग में
.......
वह अभागा लड़का
उसकी यादें
भिंगों देती हैं पलकें
बरबस टपक बड़ती
हैं बूंदें .....
कहते हैं
पुत्र जन्म से
खुशी होती है
मैं कहूं
सुपिता मिले
तो खुशी होती है |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें