संत सांप सा
केंचुल
उतारता मन
हर समय नया
बन जाता है
भूल समय के
दिए घाव
हो मस्त उड़ता
है
नभ में
भूल
लिंगभेद ,जातिभेद ,धर्मभेद
वह
तो बस
ज्योतिपुंज रहता है
जो अनुभव कर
सकता है
सुख
चिरन्तन सुख
और देखता रहता
है
इंच इंच जमीन
के लिए कटते मानव
और अपने
इर्दगिर्द बाड़ बनाते
पर जितना
बांधते खुद को
उतना
असुरक्षित रहते
कितना भाता है
उड़ना पंछी सा
पर अशरीर
महसूसना जग को
जग से रह दूर
और फिर वापस
लौट आना
अपनी दैनिक
क्रिया में
सर्वशक्तिमान
को धन्यवाद दे
दैनिक जीवन के
कर्म में .......
सच में
मानव तू
सर्वोत्कृष्ट रचना है प्रकृति की |
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