इंसान नहीं
वह
हृदय में
जिसके
करुणा की रस धार नहीं
मानव नहीं
वह पत्थर है
जिसे मनुज से
प्यार नहीं
दुसरे के दुःख
से
जो सदा
लापरवाह है
जन्म देता है
वह दुःख को ही
सदा
हमारा रूप
पड़ोसी देख रहे
बोलें भले न
सब समझें
आहों से
विस्फोट होने न दे
तू
सोच समझ कर
कर्म कर
बीज बोये जा
इमानदारी के
तू न खाया गर
तो
औलादें खायेगी
तेरी ही |
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