बुधवार, 11 दिसंबर 2013

अपनी भाषा हम भूले

अपनी भाषा में 
हम अपनी आभा में गमकते हैं
हम हंसते हैं और रोते हैं
अपने घर के संस्कार में डूबते और उतराते रहते हैं
यह जानते हुए भी
कि परदेशी भाषा
हमारे तन को आकर्षक बनाती है
हम अपनी ही लाश को सजा कर
जीते हैं
खिलखिलाते हैं
प्रतिस्पर्धा करते रहते हैं
और शान से कहते हैं .....
ये लो हम तो अपनी भाषा भूल चले |

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