मंगलवार, 4 सितंबर 2012

अवहेलित माँ


पुत्र मेरे !
माँ तेरी मैं
कैसे भूला तू मुझे ?
आज याद आया तेरा बचपन
विधवाश्रम में यूँ ही बैठे बैठे
निज भविष्य सुघड़ बनाने हेतु
माता का ऋण कैसे भूला तू ?
जी लेती
तेरे घर में
तो श्रीहीन हो जाता
तेरा घर क्या ?
मेरा भोजन ,चिकित्सा , परिधान
क्या इतना मंहगा था
कि मुझ पर खर्च कर पाया !
हंस ही लेती तेरे संग
ढूंढती तेरा बचपन
तेरी औलाद में
इतनी खुशी भी तू दे पाया ?
मेरे मकान में
तू रहे
मेरे लिये जगंह नहीं
ये कैसे था भरमाया मुझे उस दिन ?
खुश रह ! पुत्र मेरे
जीते जी
सुख दे न सका
तो मरने पर न आना मेरे
मैं न चाहूँ मुखाग्नि तेरे हाथों |
मरणोपरांत
मेरा तन खाएं चील कौए
क्षुधा तृप्त हों वे
यही दिया है आवेदन पत्र मैंने
आश्रम के व्यवस्थापक को |

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