1
ओ री !
होश सम्हालते
ही
कैसे माना
तूने
निज को
परदेशी ?
तू भी उतनी
स्वदेशी
जितना तेरा
सहोदर
जब चाहे जहां
घोंसला बना
उड़ ले अपनी
उड़ान
भर ले ताकत पख
में तू
न मनमार
मारेगा
बहेलिया तो भी
खुश रह तू
मरेगी
स्वदेश
में |
2
रात्रि सा सुखदायी
न कोय
पेट भरा हो या खाली
सुला दे
वो हमें
और भूलें हम
दुःख
दिन भर का |
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