सोमवार, 24 सितंबर 2012

क्षणिकाएं - 3

                     
         1


ओ री !
होश सम्हालते ही
कैसे माना तूने
निज को परदेशी ?
तू भी उतनी स्वदेशी
जितना तेरा सहोदर
जब चाहे जहां घोंसला बना
उड़ ले अपनी उड़ान
भर ले ताकत पख में तू
न मनमार
मारेगा बहेलिया तो भी
खुश रह तू मरेगी
स्वदेश में |

    2

रात्रि सा सुखदायी
कोय
पेट भरा हो या खाली
सुला दे 
वो हमें
और भूलें हम
दुःख दिन भर का |





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