शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

तपेदिक से मरता है आदमी


17 January 2015
07:25

-इंदु बाला सिंह

आज खुला है आकाश 
याद आया है मुझे
वह दिन
जब शोकाकुल आकाश जार जार रोये जा रहा था ........
दहाड़ें मार मार मार कर रो रहा था
किसी ने उसकी प्रेमिका की सतरंगी ओढ़नी चुरा ली थी
ओढ़नी के रंगों का बंटवारा भी कर लिये थे आपस में रंगरेज .......
आज रंग बिरंगी पतंगों के संग किलकता आकाश मुझे समझा गया 
खुले दिल से हंसने के लिये
दुःख-बदली का बरसना कितना जरुरी होता होता है
वर्ना जल जाता है जी
और
तपेदिक से मरता है आदमी |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें