रविवार, 4 जनवरी 2015

उम्मीद की रोशनी


04 January 2015
22:21
इंदु बाला सिंह


सारी दुनिया जब एक तरफ हो जाती है
तब
मन के धैर्य्य की अग्निपरीक्षा होती है ..........
और अकेला चलता मन कभी कभी  बिलबिला उठता है ........
उस वक्त किसी को क्या दोष दूं
स्वयं को भी दोषारोपण करने की क्षमता चूक जाती है ........
बस सत्य की पतवार थामें
मन जीवन की लहरों में बहते रहता है  ........
आखिर कहीं न कहीं
कभी न कभी तो मन पहुंचेगा  ही ........
यही वह काल रहता है
जब  मन में 
एक उम्मीद की मद्धिम सी रोशनी सो जाती  है
तब हो जाते हैं हम
शव सरीखे
पर हमारा दिल धड़कता रहता है
न जाने किस आस में
कौन सी प्यास में |

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