05
January 2015
10:46
-इंदु बाला
सिंह
उपन्यास , कहानियां और कवितायें अगर सुधार पातीं समाज
तो
आज
हम कुछ और होते ....
वे तो बस
आह ! से वाह !
तक हमें पहुंचा
ज्यों का
त्यों छोड़ जाती हैं
अपने ही स्थान
पर ................
हम बस कभी
किसी लेखक के नाम का
तो कभी किसी
कवि के नाम का
कीर्तन गाते
रहते हैं
ठहाके लगाते
रहते हैं
हम जानते हैं
कि
ठहाका हमारे
सेहत के लिये जरूरी है
उसके आगे
हम निरीह बन
जाते हैं .......
' अपना अपना
भाग्य ' ....कह के बस मुंह फेर लेते हैं |
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