रविवार, 4 जनवरी 2015

बटोर रही हूं तिनके


05 January 2015
09:25
-इंदु बाला सिंह


विदेशी आये थे
चले गये ...........
भूकम्प आया था
आकाश में बादल छाये थे
न जाने कब बरसे थे बादल
उठी सुबह तो पाया था मैने बूंदे पत्तों पर
बालकनी  भींजी थी
बगान की मिट्टी गीली थी ..............
अब
बटोर रहीं हूं तिनके
आंधी में बिखरे अपने घोंसले के .........
एक सन्नाटा सा छा गया है माहौल में |

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