25
January 2015
20:36
-इंदु बाला
सिंह
तीन वर्षीय
कामवाली का बेटा आता था
अपने मित्रों
के संग
मालकिन
की डेढ़ वर्षीय परी सी गुड़िया को खिलाने
इतने सारे
खिलौने
के संग वह
छोटी सी बच्ची भी एक खिलौना थी उस बेटे की ........
दोपहर का खाना भी वह बेटा खिला देता था उस प्री को
माँ को घरों
में घूम कर मित्रों संग गप्पें हांकने से फुर्सत न थी
उस छोटी सी
बच्ची के मातृत्व की महक न जाने कहां कहां उड़ रही थी
पर पर उस महक
में वह छोटी सी बिटिया न भींज पा रही थी ..........
यह कैसी
अनभूति के बीज पड़ रहे थे
उस बच्ची में
माँ
खुश थी
आजाद थी
और
बच्ची भी खुश
थी .....
पिता भोर के
निकले
देर रात आफिस
से घर लौटते थे
एक अनोखे
परिवर्त्तन की खुशबू फ़ैल रही थी
हमारे घरों
में
रिश्तों की
महक हम भूल चले थे
और
अब हम मित्रों
की मस्ती में नहा रहे थे |
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