शनिवार, 3 जनवरी 2015

कुछ खाने का मन कर रहा है


03 January 2015
23:25

-इंदु बाला सिंह


अपना मकान है न
डर किस बात का है
डाईनिंग टेबल से जितना चाहे उठा सकती हूं मैं
खा सकती हूं .........
बेटा बहु सो रहे हैं
कोई देख थोड़े न रहा है .....
धीरे धीरे वह डाईनिंग टेबल तक पहुंची ........
अरे !
खाने का मन कर रहा है तो खाऊँगी नहीं ....
ठीक है
दांत नहीं लगवाया है कोई बेटा मेरे मुंह में .....
चश्मा नहीं लगवाया है कोई बेटा मेरे आंखों पे ....
किसीसे शिकायत करने से क्या मिलेगा ....
बेटे के पापा नहीं हैं
वे रहते तो सुनते मेरी शिकायतें .....
मनचाही चीजें तो खा ही सकती हूं .....
रोटी पड़ी है
अहा !
अंचार भी पड़ा है .....
और
आंचार रोटी बड़े आराम से खा के
बी० पी० और डायबिटीज की पेशेंट
अस्सी वर्षीय वृद्धा
अपने बिस्तर पर लेट गयी ................
वह अपने मकान में थी
इसलिये निश्चिन्त वह थी
सिरहाने उसके मेडिकल कार्ड रहता था
तबीयत खराब होने पर
कोई न कोई पहुंचा ही देगा उसे अस्पताल ....
बेटे बहू तो इस समय दरवाजा बंद कर के सो रहे हैं |


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