रविवार, 18 जनवरी 2015

मानसिक गुलामी


19 January 2015
07:13
-इंदु बाला सिंह

कमाना न सीखे हम
प्यार के ही धूप में खिले थे हम
सूरज के डूबते ही घबड़ा गये हम ........
उफ्फ ये कैसा दुर्योग था
देखते ही देखते गुलाम बन गये हम ....
मौन हो गये हम ......
कितनी गजब की बात है
अब दिन के समय
हमें स्त्रीमुक्ति का पाठ पढ़ाते देख
आज यह अनूठा मन आज सोंच रहा .......
मानसिक गुलामी की जंजीर भी भला कभी टूटी है कभी |




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