शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

मोटर साइकिल चालक


30 January 2015
10:19
-इंदु बाला सिंह


मोटर साइकिल पर
पीछे बैठनेवाले तो द्पट्टा से बचा लेते हैं अपना सिर
तकलीफ तो चालक को होती है
जिसे सिर पर हौदा उलट कर चलना पड़ता है |

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

शाप


30 January 2015
06:40



-इंदु बाला सिंह

लोक कथायें कहती हैं
कि
कमजोर के दिये शाप प्रतिफलित होते हैं
अगर यह सच है
तो
आज कोई कमजोर न रहता
मात्र मुट्ठी भर आबादी शक्तिशाली न रहती
उनके पास धन का संचय न रहता
सड़क पर रिरियाता बचपन
और
पुलिया पर बैठे बुजुर्ग अपने खोये सपने न तलाशते |



सपने सच हो जाते हैं


29 January 2015
22:51


-इंदु बाला सिंह



कभी कभी हम इतना विश्वास

और आशा रख लेते हैं

किसी सुखद परिवर्त्तन पर

कि

हमारी वे अपूर्ण आशायें

हमें आक्रामक व अस्थिर बना देती हैं

बेहतर है हम भिड़ जायें समय से

पूरी ताकत से ........

हमारी आकांक्षायें पूरी होंगीं

अवश्य पूरी होंगीं हमारी चाहतें

क्योंकि

सपने सच हो जाते हैं


गर हमारे मन में दृढ निश्चय और स्थिरता हो |

कमजोर नसें


29 January 2015
18:43
-इंदु बाला सिंह

सबके अपने अपने दुःख हैं

छूना न

स्त्री और निम्न वर्ग को

ये कमजोर नसें हैं

समाज की

वर्ना

मिट जायेगा इंसान |

बुधवार, 28 जनवरी 2015

गुड़ाकूवाली


29 January 2015
12:56

-इंदु बाला सिंह

गुड़ाकू करते हुये आती थी
वह कामवाली
और
गुड़ाकू करते हुये जाती भी थी .............
मुहल्ले में उसका नाम ही पड़ गया था
' गुड़ाकूवाली '
मुंह से लार टपकाते हुये चलती थी वह
फिर भी उसे काम मिल जाता था घरों में
एक दिन दिखी वह
चेहरा सफ़ेद था उसका
पर 
मुंह लाल न था गुड़ाकू से
सुना मैंने उसका आदमी गुजर गया है .......
अब वह चुपचाप गुजरती थी सड़क पर से इधर उधर देखते हुये
पुराने चेहरों में अपनापन टटोलते हुये
उसकी
चाल की तेजी गुम गयी थी |

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

बड़ी गरीबी झेला हूं


27 January 2015
16:42

-इंदु बाला सिंह


अरे यार !
थक गये कान
अब तो
सुन सुन के सबकी गरीबी .......
जिसे देखो वही आलाप रहा है
मैं बड़ी गरीबी झेला हूं
अपने बचपन में .......
अरे !
तुम गरीब थे
तो मेरा क्यों दिमाग चाट रहे हो ?
क्यों अपमानित कर रहे हो इस धरती के करोड़ों अभावग्रस्त व्यक्तियों को ?
अरे !
आदमी तो मन से गरीब होता है
धन से नहीं |

बच्चे हैं तो हर दिवस है


26 January 2015
06:49
-इंदु बाला सिंह

बच्चे बताते
स्कूल झंडा लहराते
दूरदर्शन दिखाता हमें
दिल्ली का फहरता झंडा
गुजरती झांकियां
मुहल्ले में हमारे
मन जाता महिलाओं का गणतंत्र दिवस
और
पुरुष
निर्लिप्त से रहते
अपने काम में व्यस्त रहते
कामवालियां का कैसा गणतन्त्र दिवस !
क्या वे मास्टरनी हैं !
बच्चे हों
तो
हर दिवस है
वर्ना
हमारे घरों में
गणतन्त्र दिवस के दिन भी होता इतवार |



अजनबी के लिये निकली दुआ


26 January 2015
21:27
-इंदु बाला सिंह

कभी कभी किसी चेहरे में
कोई अपना सपना पूरा होते दिखता है
तब
उसे फलते फूलते देख
इंसान के जी से दुआ निकलती है
और
करीबी के मन से निकली दुआ
फलीभूत भी तो होती होगी
न जाने क्यों
ऐसा लगता है मुझे
वर्ना टूटे सपनों के संग जीना दूभर हो जाय
हर आदमी को |

बेहतर है अलग रहें


27 January 2015
12:01
-इंदु बाला सिंह

मन न मिलते जब
तो
आवाज शीशा उगलती हमारे कान में
बेहतर होता तब
कि सास बहु अलग रहें
बड़ा कठिन होता
आंख के आगे देखना
होते पराया अपना बेटे को
और मुस्काना
अपने मित्रों के सामने |

रविवार, 25 जनवरी 2015

मातृत्व की महक


25 January 2015
20:36
-इंदु बाला सिंह

तीन वर्षीय कामवाली का बेटा आता था
अपने मित्रों के संग
मालकिन की डेढ़ वर्षीय परी सी गुड़िया को खिलाने
इतने सारे खिलौने
के संग वह छोटी सी बच्ची भी एक खिलौना थी उस बेटे की ........
दोपहर का  खाना भी वह बेटा खिला देता था उस प्री को
माँ को घरों में घूम कर मित्रों संग गप्पें हांकने से फुर्सत न थी
उस छोटी सी बच्ची के मातृत्व की महक न जाने कहां कहां उड़ रही थी
पर पर उस महक में वह छोटी सी बिटिया न भींज पा रही थी ..........
यह कैसी अनभूति के बीज पड़ रहे थे
उस बच्ची में
माँ
खुश थी
आजाद थी
और
बच्ची भी खुश थी .....
पिता भोर के निकले
देर रात आफिस से घर लौटते थे
एक अनोखे परिवर्त्तन की खुशबू फ़ैल रही थी
हमारे घरों में
रिश्तों की महक हम भूल चले थे
और
अब हम मित्रों की मस्ती में नहा रहे थे |

शनिवार, 24 जनवरी 2015

आम की मंजरी हंसी


23 January 2015
12:00
-इंदु बाला सिंह

यह लो जी !
गया बसंत हमारे घर
आम की मंजरी हंसी
और
मैं
इन्तजार करूं
अब कच्चे आम का |

तुलसी बिन घर सूना


23 January 2015
13:59
-इंदु बाला सिंह

ओ तुलसी !
तू सबसे अच्छी
तेरे बिन घर सूना
तेरी पत्ती बिन चाय है फीकी
पंचामृत में भी तू पड़ती
यूं ही बढ़ना
जीना मेरे गमले में
और
महकना तू |

फलाने की बेटी फलाने की बहू


24 January 2015
01:37
-इन्दुबाला सिंह


भांति भांति के पेशेवाले पुरुष होते हैं
पर
औरत तो एक ही तरह की होती है
बस घर बसानेवाली किसीका
फिर
कैसी बराबरी तेरी पुरुष से
ओ री औरत !
जरा सोंच तू
क्या पहचान है तेरी ........
हर स्थान में तेरा पहचानपत्र तो
फलाने की बेटी
या
फलाने की बहू  |

मेरा बुखार बड़ा समझदार


24 January 2015
20:52

-इन्दू बाला सिंह

मेरा बुखार
बड़ा समझदार
मेरे पास वो दिन देख के आता किसी न किसी शनिवार
डाक्टर की गोली से डर के भाग जाता वो
और
सोमवार से हो जाती मैं फिट एंड फाईन     
कभी कभी तो आता मेरे पास बुखार
और
घुमाने ले के जाता वह
मुझे दुर्गा पूजा
मैं परेशान हो अस्पताल पहुंच जाती
पर
बुखार मुझे जबरन दुर्गा पूजा का पंडाल दिखाता
घर आ कर जब मैं गोली खाती
वह धीरे से चला जाता
मेरा बुखार है
बड़ा समझदार
मौसम के तेवर देख 
वह मुझसे मिलने आता |

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

सही बीज बोयें हम


23 January 2015
08:20
-इंदु बाला सिंह


कुछ तो कमी है
कहाँ कमी है
ठन्डे दिमाग से सोंचे हम
आखिर हम क्यों मारते बेटी को गर्भ में .........
और
कम उम्र बेटियां दिग्भ्रमित हो जाती ........
कभी हम उसे घर से निकालते
तो
कभी वह खुद निकल जाती हमारे घर से ..............
हमारे जी में कड़वाहट घुल जाता
हमारी चहकनेवाली बेटियों की उपस्थिति से
हमारे देखते ही देखते हमारे घर का रंग ढंग बदल जाता .........
आओ देखें हम
आज अपनी हथेली के रंग को
चिन्तन करें हम आज
और
बोयें हम आज
सही बीज
जेहन में अपने हम |

बुधवार, 21 जनवरी 2015

पुरुषार्थ करो तुम


22 January 2015
07:19

-इंदु बाला सिंह

यह कैसा सम्बन्ध है !
जहां दबे शब्दों में वसूला जाता है दहेज
यह कैसा बीज डालते हैं हम
अपने खूबसूरत सम्बन्ध मे
कि
रक्त सम्बन्धियों के साथ मिल कर
किसी की बेटी का मान मर्दन हो जाता है हमारे हाथों
अरे !
पुरुष हो
पुरुषार्थ करो तुम
नेट के पोर्न साईट पर किसीकी बेटी का विडियो डालने की धमकी न शोभा दे तुम्हें
अरे !
मन जीतो ...............
सम्बन्ध तो सदा समझौतों से बनते हैं
त्याग की ऊष्मा में फलते फूलते हैं |

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

पुरुष का दंभ


21 January 2015
07:38

-इंदु बाला सिंह

आखिर क्यों उठाते हो तुम अकेले
अपने सर पर पूरा बोझ
ओ पुरुष !
सम्हाल तो पाते नहीं तुम
कभी तुम्हारा बोझ गिर जाता है
तो
कभी तुम |
यह कौन सा दंभ है
जो
तुम्हें सदा अकड़े रहने को प्रेरित करता है
और
तुम्हारी पितृसत्ता को सींचते सींचते तुम्हें मिट्टी में मिला देता है |

जाड़े के दिनों में मुहल्ले की सड़क


20 January 2015
22:44
-इंदु बाला सिंह

सड़क पर से
एक बुजुर्ग महिला गुजरी
उसके सामने उसकी दो वर्षीय पोती चल रही थी ....
ओह !
इसके बेटे ने दूसरी जाति और भाषा की गरीब घर की लड़की ब्याह किया है
यह परिवार अजूबा है ........
एक और परिचित बुजुर्ग गुजरी सामने से
अरे !
इस महिला ने तो सिल्क की साड़ी पहनी है
क्या बात है
रोज तो अस्त व्यस्त सी फटीचर सूती साड़ी में घूमती है
कुछ तो बात है .........
और आंख के सामने उस महिला की बहू का चेहरा घूम गया
कुछ बुजुर्ग पार्क के गर्म बालू पर बैठ गये हैं
डायबिटीज से बचने के लिये भी
चलते हैं लोग ........
जाड़े के दिनों में
सुबह के दस बजे मुहल्ले की सड़क सूनी नहीं रहती
धूप से गरमायी सड़क साठ से उपरवालों की बन जाती है
तब पल भर को यूं लगता है
मानो सड़क की उम्र भी साठ से ऊपर हो गयी हो
अहा !
सड़क अब अनुभवी बन गयी है |

सोमवार, 19 जनवरी 2015

हॉउसवाईफ


19 January 2015
22:37
-इंदु बाला सिंह

उसके टूटे घर को देख
याद आया मुझे उसका अपना भरा पूरा घर
एक दिन कली आंधी में
खो गया था उसका जीवनसाथी
वह रह गयी खड़ी अपनी जगह अकेली
सब आगे बढ़ गये ........
माहौल बदला
रिश्ते बदले
बच्चो की दुनिया सजी
पर उसका महत्व कपूर की तरह उड़ गया
पल भर में देखते ही देखते वह बेजुबान मशीन बन गयी ..........
एक दिन उसने कहा था मुझसे -
काश ! मैं हॉउसवाईफ न होकर नौकरीपेशा होती
तो आज मेरे भी मित्र होते
मेरी भी अपनी जिन्दगी होती |


रविवार, 18 जनवरी 2015

मानसिक गुलामी


19 January 2015
07:13
-इंदु बाला सिंह

कमाना न सीखे हम
प्यार के ही धूप में खिले थे हम
सूरज के डूबते ही घबड़ा गये हम ........
उफ्फ ये कैसा दुर्योग था
देखते ही देखते गुलाम बन गये हम ....
मौन हो गये हम ......
कितनी गजब की बात है
अब दिन के समय
हमें स्त्रीमुक्ति का पाठ पढ़ाते देख
आज यह अनूठा मन आज सोंच रहा .......
मानसिक गुलामी की जंजीर भी भला कभी टूटी है कभी |




शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

तपेदिक से मरता है आदमी


17 January 2015
07:25

-इंदु बाला सिंह

आज खुला है आकाश 
याद आया है मुझे
वह दिन
जब शोकाकुल आकाश जार जार रोये जा रहा था ........
दहाड़ें मार मार मार कर रो रहा था
किसी ने उसकी प्रेमिका की सतरंगी ओढ़नी चुरा ली थी
ओढ़नी के रंगों का बंटवारा भी कर लिये थे आपस में रंगरेज .......
आज रंग बिरंगी पतंगों के संग किलकता आकाश मुझे समझा गया 
खुले दिल से हंसने के लिये
दुःख-बदली का बरसना कितना जरुरी होता होता है
वर्ना जल जाता है जी
और
तपेदिक से मरता है आदमी |

जीना और मरना


16 January 2015
22:41
-इंदु बाला सिंह

मरना और जीना हमारी सोंच पर निर्भर है
कभी हम जीते हुये भी मरे से रहते हैं
तो
कभी हम मरे हुये से अपने सपनों में जीते रहते हैं |

परिवार चरमरा रहा है


16 January 2015
21:41
-इंदु बाला सिंह


यह कैसा आकर्षण है
ज्ञान का ....
धन का
भौतिक सुख का ........
कि
हम दूर हो जाते हैं
अपनों से
कभी दुसरे राज्य में
तो
कभी दुसरे देश में .........
जब जब घायल होते हैं हम
शेर की तरह अपने घाव को चाट कर खुद ही ठीक करते हैं
और
अकड़ कर खड़े रहते हैं अकेले ही
यह कैसा वजूद है हमारा !
जो
हमें अपनों से दूर कर देता है ..........
त्याग के अभाव में
बुजुर्ग के प्रति सम्मान के कमी से
हमारा परिवार चरमरा रहा है
आखिर क्यों ?
फुर्सत नहीं सोंचने की हमें 
आज ..........
आफिस के ढेर सारे काम पड़े हैं न 
हमारी मेज पे |

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

माँ मित्र भी है


16 January 2015
07:26
-इंदु बाला सिंह

माँ तेरे हाथ का पका खाने को जी तरसता है
मैं तो तेरा ही बेटा हूं .....
कहनेवाले वाले बेटे ने पकड़ ली बैंक अकाउंट , जेवरों की फोटुयें अपनी मुट्ठी में
अरे !
ओ पितृसत्ता के वाहक !
माँ को छाँव की जरूरत होती है
समाज के हर त्यौहार में आनन्द उठाने की चाह होती है
एरोप्लेन में उड़ने और फाइव स्टार होटल में डिनर खाने की भी चाह होती है
माँ भी तेरी ही तरह चहकना चाहती है
माँ एक ऐसी उम्रदार इंसान होती है
जो तेरे सुख के लिये अपने खो चुकी होती है
क्या गजब है कि उसके लिये तेरे संसार में जगह नहीं ...........
माँ पूजनीय पत्थर नहीं
वह समग्र गुण दोषयुक्त लिंगभेद से पर एक इंसान भी  होती है
जिस दिन हम यह महसूस कर लेंगे
उस दिन
कब्र में पैर लटकायी माँ भी हमारी मित्र बन जायेगी |

बुधवार, 14 जनवरी 2015

उड़ी रे पतंग


14 January 2015
09:46
-इंदु बाला सिंह

अहा !
उड़ी पतंग मेरी ........
आकाश में
हुर्ररा ........
संग संग पतंग मेरे
उड़े रे ... मेरा जिया ...हुर्ररा .......
चली पतंग मेरी लेने होड़ देखो
अब बादलों से
अहा !
उड़ी रे पतंग मेरी आज तो |

पिताश्री तुम जीवित हो


15 January 2015
07:10
-इंदु बाला सिंह

तेरा आभार पिताश्री  !
जुझारू बनाने के लिये ........
सर उठा कर जीना सिखाने के लिये मुझे ......
तुम चले गये
पर
तुम्हारा स्वाभिमान जीवित है ........
तुम जीवित हो
तुम्हारा कौशल जीवित है
तुम्हारी बेटी में |

रविवार, 11 जनवरी 2015

चाभी


12 January 2015
07:16
-इंदु बाला सिंह

कहते हैं
हर ताले की चाभी होती है
ताला तो दिख रहा
पर
चाभी किसीने छुपा दी .......
तो यारो !
बड़े परिश्रम से तलाश रही हूं
अपनी  
किस्मत की चाभी |

शनिवार, 10 जनवरी 2015

बहनें



09 January 2015
23:15

-इंदु बाला सिंह 

बहनें बिला जाती हैं समन्दर में 
क्यों कि भाईयों की तरह उन्हें आपस में बांधनेवाली 
पैतृक सम्पत्ति की रज्जू नहीं रहती है ....
वे किसी का घर बसा के 
न जाने कहां खो जाती हैं |

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

अहा ! आई बिल्ली


08 January 2015
12:26
-इंदु बाला सिंह


अहा !
आई !!! ......हमारे घर हमारी बिल्ली
ले के
संग अपने दो बिलौटे .............
एक बिलौटा हुबहू अपनी माँ सा दुधिया रंग का
गोरा चिट्टा
दूजा ...... ! ......शायद अपने बाप सा
भूरा भूरा .....
दुधिया रंगवाला
चमकीली आंखोंवाला इधर उधर देख रहा था
मुझे देख छुप गया वापस
हमारे सीढ़ी - घर में ....
थोड़ी देर बाद दोनों निकले
एक के पीछे एक धूप सेंकने
देखा उन्होंने मुझे
निश्चल बैठे धूप में
पहले डर गये वे
फिर एक बिलौटा गाल टिका के बैठ गया सीढ़ी पे
उसे भी धूप चाहिये थी ......
और दूसरा भूरावाला खड़ा रहा
सहमा सा देखता रहा मुझे ......
ये  प्यार है या पहचान
न जाने क्या था
जिसे न खोना चाहती थी यह बिल्ली
साल भर घूमती थी हमारे बाग़ में
पर न घुसती थी
हमारे घर में ...............
मैंने न दिया तुझे कभी कुछ खाने को
फिर भी
ओ बिल्ली रानी !
तू आ जाती है मेरे घर
तू याद रखती है क्या मुझे !
क्या सोंचती तू ?
ओ री बिल्ली ! जरा बतला न |


सोमवार, 5 जनवरी 2015

पैसे का रिश्ता


06 January 2015
07:29
-इंदु बाला सिंह


अठारह वर्ष की उम्र में  ही  अकेली हो गयी अपनी माँ का दुःख 
दो बेटियों की माँ  बनने पर 
अस्सी वर्ष की  वह भरे पूरे घर की महिला
न भूल पायी
मिलती थी जब वह मुझसे
उसका दिल रोता था अपनी माँ के लिये
माँ को मानसिक प्रतारणा देनेवाले
रंग बदले हुये माँ के सहोदरों को याद कर ........
और
मैं महसूसती थी उसका दर्द ......न जाने क्यों ?
एक दिन परेशान हो कर मैंने पूछा पैसे से ....
ओ पैसे !
तू आदमी की लाश की खाद पर बढ़ता है क्या
पर
मेरे प्रश्न को अनसुना कर उस ने
मुझसे मुंह फेर लिया  |

रविवार, 4 जनवरी 2015

हम निरीह बन जाते हैं


05 January 2015
10:46

-इंदु बाला सिंह


उपन्यास  ,  कहानियां और कवितायें  अगर सुधार पातीं समाज
तो
आज हम कुछ और होते ....
वे तो बस
आह ! से वाह ! तक हमें पहुंचा
ज्यों का त्यों छोड़ जाती हैं
अपने ही स्थान पर ................
हम बस कभी किसी लेखक के नाम का
तो कभी किसी कवि के नाम का
कीर्तन गाते रहते हैं
ठहाके लगाते रहते हैं
हम जानते हैं
कि
ठहाका हमारे सेहत के लिये जरूरी है
उसके आगे
हम निरीह बन जाते हैं .......
' अपना अपना भाग्य ' ....कह के बस मुंह फेर लेते हैं |

बटोर रही हूं तिनके


05 January 2015
09:25
-इंदु बाला सिंह


विदेशी आये थे
चले गये ...........
भूकम्प आया था
आकाश में बादल छाये थे
न जाने कब बरसे थे बादल
उठी सुबह तो पाया था मैने बूंदे पत्तों पर
बालकनी  भींजी थी
बगान की मिट्टी गीली थी ..............
अब
बटोर रहीं हूं तिनके
आंधी में बिखरे अपने घोंसले के .........
एक सन्नाटा सा छा गया है माहौल में |

अलग अलग तरीके से होती है मौत


05 January 2015
09:07
-इंदु बाला सिंह


मौत आदमी और औरत की
अलग अलग तरीके से होती है आये दिन ..........
आदमी मरता है सड़क की दुर्घटना में
और
औरत मरती है
रसोईं में तीली जलने की दुर्घटना में ........
आज हुआ उपलब्द्ध ज्ञान
सुना जब मैंने ........
पास की  बस्ती में जल मरी बिटिया |

अजूबी रीत


05 January 2015
07:19
-इंदु बाला सिंह


जग की
अजूबी रीत है देखी यारो !
जो चलती
बड़े शान से
साड़ियों में
चाहे दस हजार के मूल्य की हो
या
सौ रूपये के मूल्य की ........
कीर्तिगान गाती साडियां ........
अपने बेटा का
अपने बेटी के आदमी का
अपने व्रत का
अपने रस्मों का .................
काश !
उन साड़ियों में
एक जीवंत स्वाभिमान होता
कुछ अन्वेषण होता
कुछ खुशबु होती |

अकेली सास


04 January 2015
22:59
-इंदु बाला सिंह

मेरी सास अकेली है न
इसलिये
मेरी देवरानी देवर व बच्चे एक साथ एक ही कमरे में सोते हैं
हमारा पैतृक घर तो गांव में है ......................
अपनी सहकर्मी के मुंह से सुन यह वाक्य
अचंभित व तृप्त हो गया मन
शायद मिटा न था संस्कार उस घर से
और
याद आयी मुझे .......
अपनी माँ |

उम्मीद की रोशनी


04 January 2015
22:21
इंदु बाला सिंह


सारी दुनिया जब एक तरफ हो जाती है
तब
मन के धैर्य्य की अग्निपरीक्षा होती है ..........
और अकेला चलता मन कभी कभी  बिलबिला उठता है ........
उस वक्त किसी को क्या दोष दूं
स्वयं को भी दोषारोपण करने की क्षमता चूक जाती है ........
बस सत्य की पतवार थामें
मन जीवन की लहरों में बहते रहता है  ........
आखिर कहीं न कहीं
कभी न कभी तो मन पहुंचेगा  ही ........
यही वह काल रहता है
जब  मन में 
एक उम्मीद की मद्धिम सी रोशनी सो जाती  है
तब हो जाते हैं हम
शव सरीखे
पर हमारा दिल धड़कता रहता है
न जाने किस आस में
कौन सी प्यास में |

शनिवार, 3 जनवरी 2015

कर्म बोलते हैं


04 January 2015
07:52
-इंदु बाला सिंह

शब्द हैं जब तक
मैं जिन्दा हूं पन्नों में
मेरी सन्तान जब तक जिन्दा है
मैं जीवित हूं उनके मन के तरंगों में
कितना भी मारो तुम मुझे
याद आउंगी मैं तुम्हें
बरसाती रातों में
माना जन्मी हूं मौसम से
और
समा जाउंगी मौसम में
पर
कहानियों में रहूंगी जीवित मैं
क्योंकि
कर्म जीवित रहते हैं ......
और
वही बोलते भी हैं |

बुकुर बुकुर मुंह ताकती माँ


04 January 2015
07:46
-इंदु बाला सिंह


बेटों के शीतयुद्ध में
बुकुर बुकुर
उनका मुंह ताकती
ओ री माँ !
पिता ने तो खुद को मजबूत कर लिया था
तूने क्यों न मजबूत किया खुद को ..........
आजीवन सेविका बनी रही 
तू अपनों की.........
भला क्यों ?

कुछ खाने का मन कर रहा है


03 January 2015
23:25

-इंदु बाला सिंह


अपना मकान है न
डर किस बात का है
डाईनिंग टेबल से जितना चाहे उठा सकती हूं मैं
खा सकती हूं .........
बेटा बहु सो रहे हैं
कोई देख थोड़े न रहा है .....
धीरे धीरे वह डाईनिंग टेबल तक पहुंची ........
अरे !
खाने का मन कर रहा है तो खाऊँगी नहीं ....
ठीक है
दांत नहीं लगवाया है कोई बेटा मेरे मुंह में .....
चश्मा नहीं लगवाया है कोई बेटा मेरे आंखों पे ....
किसीसे शिकायत करने से क्या मिलेगा ....
बेटे के पापा नहीं हैं
वे रहते तो सुनते मेरी शिकायतें .....
मनचाही चीजें तो खा ही सकती हूं .....
रोटी पड़ी है
अहा !
अंचार भी पड़ा है .....
और
आंचार रोटी बड़े आराम से खा के
बी० पी० और डायबिटीज की पेशेंट
अस्सी वर्षीय वृद्धा
अपने बिस्तर पर लेट गयी ................
वह अपने मकान में थी
इसलिये निश्चिन्त वह थी
सिरहाने उसके मेडिकल कार्ड रहता था
तबीयत खराब होने पर
कोई न कोई पहुंचा ही देगा उसे अस्पताल ....
बेटे बहू तो इस समय दरवाजा बंद कर के सो रहे हैं |