पड़ोसन झोपड़ी
बड़ों की
बस्ती में
अपने पर
पड़नेवाली
गिद्ध दृष्टि
से
हर
पल बचाती रहती थी
खुद को
भय रहता था
उसको
सो चुप रहती
थी
एक दिन
जब अकेला था
बड़ा मकान
तब पूछ बैठा
पड़ोसन से ...
मित्र !
तुम बोलती
नहीं हो
इतनी चुप चुप
क्यों रहती हो ......
कुछ तो बोलो
देखो
मेरे दीवारों
पर कितने घाव हैं
वे
आपस में
बतियाते रहते हैं
रोते हैं मेरे
घर में
लोग
मुझसे अकेले
में अपना दुःख बांटते हैं
फिर न जाने
कहां चले जाते हैं
मैं उनका
इंतजार करता रहता हूं
दुखी रहता हूँ
काश !
मैं भी
तुम्हारी तरह खुश रह पाता .......
उसके दुःख से
द्रवित हो गयी
झोपड़ी
पर चुप रही
बड़ों की बातों
में पड़ना
बुद्धिमानी
नही ......
यह बात
उसके इकलौते
मालिक ने
उसे समझाई थी
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