06 May
2014
13:40
-इंदु बाला
सिंह
एक दिन
भरी दुपहरी
में
बोल उठा फल
से लदा
आम
का पेड़ ......
ओहो !
दिदिया !
आज बिजली गुल
हो गयी क्या ?
अच्छा किया
तुमने
जो
आ गयी मेरे
पास
और
उस
जेनरेटरवाली
घमंडी पड़ोसन
के पास न गयी तुम .....
याद है दिदिया
!
जब तुम दस साल
की थी
और
मेरे पेड़ के
नीचे
चादर से मुंह
ढांप के सोती थी
तब
मैं
सबेरे सबेरे
अपना एक फल
गिरा देता था
तुम्हारे
सिरहाने
और
तुम डर जाती
थी
कहती थी
.........
अरे !
मेरे सर पर
गिरता
तो क्या होता
........
मैं हंस कर
सोंचता
ओ री बहना !
ऐसा
कभी न होगा
......
आज भी आंधी
में
मुझसे अलग हुए
मेरे फल
जब तुम चुनने
आती हो
तो
मुझे याद आता
है
ओ मेरी बहना
!.........
जब तुम छोटी
थी
और मैं आंधी
सहने लायक
मजबूत न था
तब
तुम
स्वयं को भूल
मुझे पकड़ के
खड़ी हो जाती
थी
उस समय
मैं इतना
विशाल न था
......
तुम सोंचती थी
कहीं मैं जड़
से ही
न उखड़ जाऊं
........
हाथ की
पत्रिका के पन्ने
खुले के खुले
ही रह गये उसके
एक भी पंक्ति
न पढ़ पाई
वह
क्योंकि
आम के पेड़ ने
हलचल मचा दी
थी
उसके
मस्तिस्क में
और
वह अपने बचपन
में
लौट गयी
थी |
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