03 May
2014
07:20
- इंदु बाला सिंह
आफिस में
हम समस्याओं
का सामना करें
हंस कर
सहकर्मियों से गप्पें मारें
बॉस से दब
कर बात करें
पर
घर में
असहनीय लगे
तेवर
पत्नी के .......
औलाद की ना
नुखुर
भारी
लगे ......
भला क्यूँ ?
कहीं हममें
अर्थोपार्जन
का
अहं तो नहीं
पल रहा ......
ढेर सारे
दहेज के साथ घर में आई पत्नी की तनख्वाह
हमें अनजाने
में
श्रीहीन तो
नहीं बना रही ....
घर के
बुजुर्गों की नसीहत
हमें मुसीबत
तो नहीं लग रही .....
पैंसठ वर्ष
तक
आफिस में
हमारा मान व पहचान
हमें वजूद
देता है
खुबसूरत
अनुभव देता है
तो
हमारे अपने
बच्चों का बचपन
पत्नी का
सहारा
जीवन यात्रा
के समय हमारे कम्पार्टमेंट से
अपने पड़ाव पर
उतर गये बुजुर्ग
भी हमें बहुत
कुछ सीख देते है ..........
इन्हीं
अनुभूतियों को बांटते हुए
जी लेते हैं
हम
और
आनेवाली पीढ़ी
के लिए
एक सजीव
उदहारण बन जाते हैं |
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