मंगलवार, 20 मई 2014

बचपन की खुशबू


13 May 2014
18:25

-इंदु बाला सिंह

आगे की राह
जब
वृक्षहीन हो जायें
और
समय का सूरज
प्रचंड हो
तब
हम धीमे धीमे चल
बचपन की सुरक्षित उत्सुक फुहारों में भींज
अपने चारों ओर
खुशबू का
एक महीन आवरण बना
हम
लू के मारात्मक थपेड़ों से
बच जाते हैं.....
धन्यवाद स्वत: फूट पड़ता हैं
उस
समय के लिए
जिसने
हमसे हमारा बचपन न छीना था |

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